इतनी चाहत तो लाखो रुपए पाने
की भी नहीं होती ,
जितनी बचपन की तस्वीर देखकर
बचपन में जाने की होती है …..
जिंदगी जब भी सुकून दे जाती है,
ए बचपन हमें तेरी याद आती है
बचपन में लगी चोट पर मां की हल्की-हल्की फूँक
और कहना कि बस अभी ठीक हो जाएगा!
वाकई अब तक कोई मरहम वैसा नहीं बना!
बचपन का वो दिन और सुहानी रातें
चूरन की गोलियां हंसी मजाक की बातें
ना कोई फासले दिल में ना रिश्तो की दीवार,
होती थोड़ी शैतानियां थोड़ी सी तकरार
ना कोई चिंता भविष्य की ना कोई परवाह
ऐ खुदा ले चल मुझे फिर से उसी राह
सावन के झूले, फूलों की वह डाल,
हंसते मुस्कुराते गुजरता था बचपन का हर साल
खबर ना थी धूप की ना शाम का ठिकाना था
बारिश में कागज की नाव और पानी का बौछारा था,
जिंदगी में आगे निकलने की ना होड़ थी
हाथ में पतंग का मांजा और सफेद डोर थी,
वो ताजी हवा,मीठा पानी और वो खुशहाली
वो गन्ने का रस, आम की कैरियां और वो हरियाली
इंद्रधनुष के प्यारे रंग और ध्रुव तारा था
सोच कर देखो जरा बचपन कितना प्यारा था।
बचपन हर किसीका होता है
लेकिन बचपना हर कोई नही जीता,
हम चाहे लाख बड़े हो जाये ऊँचाइयाँ छू ले,
लेकिन बचपना जीने के लिए कोई tag नही लगता,
हसी मजाक हर कोई करता है लेकिन बच्चो जैसी हसी हर कोई नही हस पाता !
काश मैं लौट जाऊं…
बचपन की उन हसीं वादियों में ऐ जिंदगी
जब न तो कोई जरूरत थी और न ही कोई जरूरी था!
बिना समझ के भी, हम कितने सच्चे थे, वो भी क्या दिन थे, जब हम बच्चे थे
याद है…
वो बचपन की अमीरी,
न जाने अब कहां खो गई…
वो दिन ही कुछ और थे,
जब बारिश के पानी में हमारे भी
जहाज चला करते थे…
सुना है अब बड़े हो गए है हम
अब जो अपने पैरो पे खड़े हो गये है हम।
इक वो शाम होती थी,जो दोस्तों के नाम होती थी,
इक शाम आज होती है,सिर पर दिन भर की थकान होती है।
अब समझ है हमें अपनी जिम्मेदारियों की,
भला किसे जरुरत है अब यार और उनकी यारियों की।
वो दादी की कहानियां कितनी सच्ची लगती थीं
झूठी थी पर फिर भी अच्छी लगती थी।
ये वो दौर था जब बच्चे थे हम,
कितना झूठ बोलते थे पर दिल के सच्चे थे हम।
वक़्त भी बदला है ,थोड़ा बदले है हम
बचपन तो चला गया, पर दिल से बच्चे है हम।
खबर है हमें वो वक़्त लौट के ना आएगा।
नादान ये दिल फिर भी उन यादों को दोहराएगा ।
“बाल दिवस” एक इच्छा है भगवन मुझे सच्चा बना दो, लौटा दो बचपन मेरा मुझे बच्चा बना दो।। चलो, फिर से बचपन में जाते हैं खुदसे…
गाँवो में है
फटेहाल नौनीहाल
व भूखा किसान
फिर भी हुक्म के तामील में
लिख रहे मेरा भारत महान
कुछ अपनी हरकतों से,
तो कुछ अपनी मासूमियत से,
उनको सताया था मैंने,
कुछ वृद्धों और कुछ वयस्कों को,
इस तरह उनके बचपन से मिलाया था मैंने।
ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली
बचपन बेचकर जवानी खरीद ली
न वक़्त, न खुशी, न सुकून
सोचता हूँ ये कैसी जिन्दगानी खरीद ली!
जब दिल ये आवारा था,
खेलने की मस्ती थी।
नदी का किनारा था,
कगज की कश्ती थी।
ना कुछ खोने का डर था,
ना कुछ पाने की आशा थी।
वो क्या दिन थे…
मम्मी की गोद और पापा के कंधे,
न पैसे की सोच और न लाइफ के फंडे,
न कल की चिंता और न फ्यूचर के सपने,
अब कल की फिकर और अधूरे सपने,
मुड़ कर देखा तो बहुत दूर हैं अपने,
मंजिलों को ढूंडते हम कहॉं खो गए,
न जाने क्यूँ हम इतने बड़े हो गए,
काश मैं लौट जाऊं… बचपन की उन हसीं वादियों में ऐ जिंदगी जब न तो कोई जरूरत थी और न ही कोई जरूरी था!
नन्हीं-नन्हीं यादों सा था बचपन…
न जाने कब बढ़ा हो गया
बचपन में लगी चोट पर मां की हल्की-हल्की फूँक
और कहना कि बस अभी ठीक हो जाएगा!
वाकई अब तक कोई मरहम वैसा नहीं बना!
ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली
बचपन बेचकर जवानी खरीद ली
न वक़्त, न खुशी, न सुकून
सोचता हूँ ये कैसी जिन्दगानी खरीद ली!
इतनी चाहत तो लाखो रुपए पाने
की भी नहीं होती ,
जितनी बचपन की तस्वीर देखकर
बचपन में जाने की होती है …..
ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली
बचपन बेचकर जवानी खरीद ली
न वक़्त, न खुशी, न सुकून
सोचता हूँ ये कैसी जिन्दगानी खरीद ली!
बचपन से बुढ़ापे का बस इतना सा सफ़र रहा है
तब हवा खाके ज़िंदा था अब दवा खाके ज़िंदा हूँ।।
खूबसूरत था इतना के महसूस भी ना हुआ . . .
कब, कहाँ, कैसे . . .
मेरा बचपन बीत गया . . .
ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने का डर
बस अपनी ही धुन, बस अपने सपनो का घर
काश मिल जाए फिर मुझे वो बचपन का पहर….
सुना है अब बड़े हो गए है हम
अब जो अपने पैरो पे खड़े हो गये है हम।
इक वो शाम होती थी,जो दोस्तों के नाम होती थी,
इक शाम आज होती है,सिर पर दिन भर की थकान होती है।
अब समझ है हमें अपनी जिम्मेदारियों की,
भला किसे जरुरत है अब यार और उनकी यारियों की।
वो दादी की कहानियां कितनी सच्ची लगती थीं
झूठी थी पर फिर भी अच्छी लगती थी।
ये वो दौर था जब बच्चे थे हम,
कितना झूठ बोलते थे पर दिल के सच्चे थे हम।
वक़्त भी बदला है ,थोड़ा बदले है हम
बचपन तो चला गया, पर दिल से बच्चे है हम।
खबर है हमें वो वक़्त लौट के ना आएगा।
नादान ये दिल फिर भी उन यादों को दोहराएगा ।
बचपन में मेरे दोस्तों के पास घड़ी नहीं थी…
पर समय सबके पास था!
आज सबके पास घड़ी है
पर समय किसी के पास नहीं!
नन्हीं-नन्हीं यादों सा था बचपन…
न जाने कब बढ़ा हो गया
काश मैं लौट जाऊं…
बचपन की उन हसीं वादियों में ऐ जिंदगी
जब न तो कोई जरूरत थी और न ही कोई जरूरी था!
यादों की धुंध में ढूँढता हूँ मैं अपना बचपन।💐 वो पापा की डांट का कंपन, फिर माँ का निष्पक्ष समर्थन।😊 वो ऊर्जा से परिपूर्ण तन-मन, और बच्चों वाला स्वच्छ अंतर्मन।☺️ वो पढ़ाई की थोड़ी सी उलझन, और ख़ुशियों का रोज़ का दर्शन। प्रभु लौटा दो बस वो इक क्षण तुझे मैं कर दूँ जीवन अर्पण।
ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने का डर,
बस अपनी ही धुन, बस अपने सपनो का घर…
काश मिल जाए फिर मुझे वो बचपन के दिन!
कैसा वो बचपना था;🐰 मानो, सपना एक सुहाना था..🍃 रंग बिरंगी डाक टिकट, मैं कितने लगन से इकट्ठा करता। एक कापी में सारे चिपकाता;📙 उन्हें रोज ख़ूब निहारता। इंग्लैंड, फिर न्यूजीलैंड;🇬🇧 धरती का स्वर्ग, स्विट्जरलैंड.. पोलैंड व कोरिया;🇧🇯 मलेशिया होकर लैंड करता रशिया; अफ्रिका से अमरीका, बैठे बैठे दुनिया के चक्कर लगाता। फिर ‘तू’ मिली, मेरी ‘दुनिया’ बनी। तुझमें खुद को पाया.. 📙’कापी’ वो भूला; तुझ संग ख़्वाबों की नगरी घूम आया। ..बीती यादों का अल्बम आज देखा,💘 दिल ये भर आया। बचपन कब का खोया; बच्चा बन मैं सिसक कर रोया.. चार दीवारों में सिमटे, अपने धुँधले आसमान से लिपटकर; एक ‘बालक’ नम आँखों से,🗿 रात फिर अकेला सोया।
वो भी क्या दिन थे
जब हम स्कूल से आते
भूख की रट लगाते थे
वो भी क्या दिन थे
जब हम बिन सुर ताल
बेखौफ गाते थे
वो भी क्या दिन थे
जब हम होमवर्क ना कर पाने के
सौ सौ बहाने बनाते थे
वो भी क्या दिन थे
जब हम कुल्फी
टपका टपका कर खाते थे
वो भी क्या दिन थे
जब हम अपनी गुड़िया की
शादी रचाते थे
वो भी क्या दिन थे
जब हम रातों को चैन से
लोरी सुन सो जाते थे
वो भी क्या दिन थे
वो बचपन कीअमीरी न जाने कहां खो गई
जब पानी में हमारे भी जहाज चलते थे…
खूबसूरत था इतना के महसूस भी ना हुआ . . .
कब, कहाँ, कैसे . . .
मेरा बचपन बीत गया . . .
ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने का डर
बस अपनी ही धुन, बस अपने सपनो का घर
काश मिल जाए फिर मुझे वो बचपन का पहर….
बचपन में…
जहां चाहा हंस लेते थे, जहां चाहा रो लेते थे!
पर अब…
मुस्कान को तमीज़ चाहिए और आंसूओं को तनहाई!
वास्तविकता को जानकर,
मेरा भी सपनों से समझौता हुआ,
लोग यही समझते रहे,
लो एक और बच्चा बड़ा हुआ।
कौन कहता है कि…
बचपन वापस नही आता
दो घड़ी अपनी माँ के पास
बैठ कर तो देखो
खुद को बच्चा महसूस ना करो
तो फिर कहना..
आसमान में उड़ती…
एक पतंग दिखाई दी…
आज फिर से मुझ को..
मेरी बचपन दिखाई दी..
माना बचपन में, इरादे थोड़े कच्चे थे।
पर देखे जो सपने, सिर्फ वहीं तो सच्चे थे।